श्रीवास्तव र., . (१९४४). मनुष्य ही अपने भाग्य का निर्माता है. प्रयाग: छात्रहितकारी पुस्तकमाला.
श्रीवास्तव राधेश्याम, . १९४४. मनुष्य ही अपने भाग्य का निर्माता है. प्रयाग: छात्रहितकारी पुस्तकमाला.
श्रीवास्तव राधेश्याम, . मनुष्य ही अपने भाग्य का निर्माता है. प्रयाग: छात्रहितकारी पुस्तकमाला. १९४४.